कुछ बातें अनजानी सी, या एक मनमोहक कहानी सी…
कुछ बातें अनजानी सी, या एक मनमोहक कहानी सी…
वह शाम अनोखी थी…
सपनों में लिपटी थी,
खुशबू समेटे थी,
रंगों से सँवरी थी,
धुनों में पिरोई थी…
चाँदनी की कोमल आभा में
कुछ अनकही…
कुछ अनजानी-सी।
जैसे मुझसे कुछ कहना चाहती हो…
और मैं—
तारों से सजे अंबर को निहारते हुए,
बस उसकी
उन सुरों में पिरोई हुई
धीमी-सी फुसफुसाहट का
आभास भर कर रहा था…
वह शाम…
सचमुच कुछ अलबेली थी।
यहाँ बस मैं हूँ…
हवा चली हल्की-सी,
कलियाँ महकीं फूलों की,
शाम हुई धुँधली-सी,
गोधूलि की उस वेला में…
कुछ बातें हुईं अनजानी-सी,
कुछ हम कहें…
कुछ तुम कहो…
चाँदनी रात में,
जुगनुओं की बारात में…
हम देख रहे हैं…
यह हवा,
लहराती हुई,
पेड़ों की ओट में गुनगुनाए जा रही है…
और लगता है—
वह हमें भी देख रही है।
सब सामान्य-सा होकर भी…
असामान्य है।
हर क्षण
स्वयं को एक नए रूप में
उभार रहा है—कभी तारों में,
कभी धुनों में,
कभी रागों में…
और कभी
तुम्हारी
अनकही लीलाओं में…
यहाँ,
हर पल जो अनुभूत हो रहा है…
हर क्षण…
मानो उसे
शब्दों में बाँधने का प्रयास कर रहा हूँ।
क्या यह सचमुच केवल एक भ्रम है?
पर न जाने क्यों—
जितना उसे शब्दों में समेटना चाहता हूँ,
वह उतना ही
शब्दों से परे
महक उठता है…
कभी हँसाए,
कभी रुलाए…
बस अपना नृत्य रमे जा रही है।
यह अलबेली,
हवाओं संग खेलती हुई…
कभी इधर,
कभी उधर…कभी सवेरे,
तो कभी…
आज,
इस शाम…
अपना ही खेल सजा रही है।
समझ न आए—
ऐसा रास रचा रही है…
ऐसे परपंच में,
मैं—
अनजानी,
जादू से बेगानी,
सादगी में लिपटी…
तेरा तिलिस्म न जानूँ,
तेरा जादू न जानूँ…
क्या हैतेरा इरादा…
न जानूँ।
फिर भी…
मन उसके इन भ्रमों से,
सुनहरे आभासों से,
मंत्रमुग्ध होता चला जा रहा है।
कहने कोएक प्रभात फिर आएगा।
पर मेरा मन…
अभी भी…
रात्रि के इन्हीं भ्रमों मेंबंधा है…
यह रात्रि…
कुछ अधिक अनजानी थी।
कुछ दीवानी थी…
हवा भी मिठास और सुगंध समेटे,
मंद-मंद बह रही थी…
जादू बुनती,
तिलिस्म दिखाती…
और न जाने क्यों—
मन कोअपने संग,
अपने ही रास में
बहाए लिए जा रही थी…
यह रचना रात्रि, प्रकृति, सौंदर्य और अनुभूति के
उन सूक्ष्म क्षणों को स्पर्श करती है,
जहाँ प्रकृति केवल एक दृश्य नहीं रहती।
कभी किसी शांत संध्या, किसी मंद समीर, किसी सुगंध या
किसी अनजानी रात्रि का तिलिस्म हमें इस प्रकार स्पर्श करता है,
कि हम कुछ देर उसके साथ ठहर जाते हैं।
शायद जीवन के कुछ अनुभव ऐसे ही होते हैं।
उन्हें हर बार समझना आवश्यक नहीं होता।
कभी-कभी केवल अपने मन में उठते विचारों, अनुभूतियों,
आत्मचिंतन और मौन को देखना ही पर्याप्त होता है।
संभवतः ऐसे ही क्षण जीवन, प्रकृति और स्वयं को देखने की
हमारी दृष्टि को थोड़ा और गहरा बना जाते हैं।
माया · लीला · अनंत
Written by Maayedo