abstract silhouette with warm lights, flowing threads and subtle music symbols, reflecting माया and inner ठहराव

वह गीत जो मेरा कभी था ही नहीं

माया और भ्रम के सूक्ष्म अनुभवों में ठहरे…
कभी-कभी हम उस धुन में खो जाते हैं—
जो कभी हमारी थी ही नहीं।

वह गीत…
जो पहली बार केवल एक धुन था,
अब एक ठहराव बन चुका था।
मैं उसे सुनता नहीं था,
उसमें ठहर जाता था।
हर पुनरावृत्ति में,
वही सुर, वही शब्द—
जैसे समय ने स्वयं को उसी क्षण में बाँध लिया हो।
और अजीब बात यह थी कि
मुझे यह बंधन अच्छा लगने लगा था…
जैसे कोई मधुर भ्रम,
जो यह विश्वास दिलाता है कि
इसके बाहर कुछ है ही नहीं।

और यदि इसके परे कुछ हो भी…
तो शायद मैं उसे देखना भी न चाहूँ।
यह गीत इतना सुंदर है कि—
कैसे कहूँ…
कैसे इससे बाहर निकल जाऊँ…
कैसे मान लूँ कि यह सत्य नहीं।
यह गीत
मेरे इतने समीप होकर भी मेरा नहीं,
फिर भी मन है कि मानता नहीं—
मानता ही नहीं
कि यह केवल एक क्षणिक जश्न है,
और मैं…
उसका अंश भी नहीं।

कहने को तो यह गीत
इन शब्दों और सुरों से परे कुछ भी नहीं,
पर मैं अपनी संपूर्ण जीवन-धारा
इसमें महकती हुई अनुभव कर सकता हूँ।
जैसे आसपास का समय
कहीं थम-सा गया हो,
और यह गीत ही एकमात्र स्पंदन बनकर
जीवित रह गया हो—
जो मुझे
धीरे-धीरे, अनायास ही
अपने साथ बहाए लिए जा रहा है।

इन कोमल सुरों के सौंदर्य ने मुझे मोह लिया है…
अब इस माया और मेरे बीच कुछ भी शेष नहीं।

एक नई धुन,
जैसे किसी अपरिचित खुशबू की भाँति,
मेरे इस सधे हुए संगीत में घुलने लगी है।
यह मेरा अंश नहीं…
फिर भी धीरे-धीरे
मेरे ही गीत को ओझल करती जा रही है।
एक विचित्र बेचैनी, एक आकुलता—
मुझे भीतर तक डगमगा रही है।
मैं अपनी ही धुन को खोजने में व्याकुल हूँ,
पर यह नई महक
अनजाने ही
एक नया जाल बुन चुकी है…

मेरे गीत के धुंधलाते हुए सुरों के पीछे भागते-भागते,
अब अपने ही कदमों में
एक विचित्र जकड़न महसूस होने लगी है।
कहने को तो हर प्रयास
मुझे आगे ले जाना चाहता है,
पर मेरे चारों ओर
एक गहरा ठहराव उतर आया है।
मेरा मन विस्मित है—
जिस संगीत के बहाव में
मैं अब तक बहता चला जा रहा था,
वह बहाव तो आगे बढ़ रहा है…
पर मैं—
यहीं कहीं ठहर गया हूँ।

मेरा वह गीत
कहीं खो गया है…
और यह नई महक
अब मेरी साँसों में ही घुल चुकी है।
अब जब इसके अतिरिक्त
कुछ भी शेष नहीं—
इस ठहराव के बीच
मैं केवल अपनी साँसों को
और इस महक को ही अनुभव कर पा रहा हूँ।
और आश्चर्य यह है कि—
न तो मुझे इससे भय लगता है,
न ही कोई घबराहट होती है।
बल्कि…
इसी अनजानी सी अनुभूति में
कहीं एक नया प्रतिबिंब
धीरे-धीरे उभरने लगा है।

कहीं न कहीं
मेरी आत्मा इस नई खुशबू को अपनाने में लगी है।,
पर मेरा मन अब भी
पूर्णतः शांत नहीं हो पाया है।
यह सहमा हुआ-सा दृश्य भी
मुझे अपनी ओर खींच रहा है—
जैसे यह एहसास
और कुछ नहीं,
बल्कि समय द्वारा मेरी निद्रा में पिरोए गए धागे हों…
और उन्हीं धागों से
मैं अनजाने ही
अपनी एक नई कहानी बुन रहा हूँ।

हर धुन केवल एक क्षणिक जश्न है—
जिसमें हम अपना एक अक्स ढूँढते हैं।

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