वृद्धावस्था पर कविता – soft petals in golden light reflecting time, life, and aging

तेरी बारी, मेरी बारी — समय का अनंत खेल

उम्र, समय और जीवन के बदलते पड़ावों पर एक सूक्ष्म चिंतन

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वह आई…
धीरे-धीरे, जैसे कोई धुन दूर से पास आती हो—
अनकही, अनसुनी…
फिर भी जानी-पहचानी।

कहीं दूर…
जब उसे चुपके से आते देखा—
तो मन ही मन सोचा…
अभी नहीं… अभी तो नहीं।

मैंने उसे देखा…
और हँसकर टाल दिया—
जैसे कोई सत्य, सामने होकर भी,
मन को रास न आए।

मैं इतराई,
मैं बलखाई—
अभी कहाँ, अभी क्यों…
अभी तो मैं हूँ—
अपने ही रंग में डूबी, अपने ही ढंग में खोई।

जैसे समय के साथ,
वृद्धावस्था भी चुपचाप अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है…

वह मुस्कराई…
धीमे से, जैसे कोई खेल आरम्भ हो—
कुछ उसका… और कहीं मेरा भी।

वृद्धावस्था आयी रे, मैंने देखा उसे दूर से।
मैं इतराई और बलखाई—मुझे अभी तू रास ना आई।
मैं मुस्कायी, मैं अकुलायी—
अरे वृद्धा, तू मेरा क्या ले जायी।

बचपन बीता, आई जवानी।
वृद्धा अवस्था मुझे देख ना पाई।
मैं पूरे जोश में, जवानी के मदहोश में—
मैं मुस्कायी, वृद्धा तू मुझे पकड़ ना पाई।

वृद्धा बोली—अरे मनचली, क्यों इतराई?
मैं तो सबके पीछे ही आई।
अब तू आगे, कल मैं आगे—
यह मेरा खेल पुराना है।

ढली जवानी—वृद्धा अवस्था
उपहार में ले आई कुछ बीमारियाँ।
वो मुस्करायी और बोली—
अरे चुलबुली, क्यों ठिठक गयी?

तेरी बारी, मेरी बारी—
यही खेल पुराना है।
मान लिया इस बार तूने मुझे भ्रमाया है—
कल हँसाया, आज रुलाया…
ईश्वर का उपहार भी तूने ही दिखलाया है।

यह कुछ नया नहीं…
समय से परे तेरा अद्भुत बुलावा है…

मैं हर्षायी—
और तू मुस्कायी…

किसी और रूप, किसी और राह पर…
अगले जन्म भी देखेंगे—
कहाँ तक साथ चले जाना है।

और तब भी...
धीमे से, समय का कोई मौन खेल फिर आरम्भ हो—
कुछ उसका…
और कहीं मेरा भी…

यह रचना समय, उम्र और जीवन के बदलते पड़ावों के बीच एक मौन संवाद है।
बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक, हर व्यक्ति इस यात्रा से गुजरता है—जहाँ अंततः एक शांत स्वीकृति स्वयं प्रकट होती है…


माया · लीला · अनंत
Written by Maayedo

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