
कुछ बातें अनजानी सी, या एक मनमोहक कहानी सी…
शब्दों के इस दर्पण में, स्वयं का एक अक्स झलकता है…
नीले आकाश में तैरते कुछ धुंधले से बादल… जिन्हें अब पन्नों की ज़मीन चाहिए।
मौन और शोर के बीच की वह पहली धड़कन… जहाँ एक कहानी सांस लेने लगती है।
माया के जादुई दर्पण में झाँकती आपकी अपनी चेतना… जिसे शब्दों ने पहचान लिया है।
दिनभर की धूप के बाद मिलने वाली वह ठंडी छाँव… जहाँ मन अपनी थकान उतारकर मुस्कुराने लगता है।
माया वह कोमल-सा आवरण है,
जो सत्य की उज्ज्वल ज्योति को हल्के से ओढ़ लेता है।
सब कुछ सामने होते हुए भी,
पूर्णतः स्पष्ट नहीं होता।
और यदि कभी स्पष्ट हो भी जाए,
तो मन उसे स्वीकार करने को सहज नहीं होता।
रहस्य से भी अधिक,
यह आवरण मन को मोह लेता है।
भ्रम हमारी चेतना का वह पहलू है,
जो अनजाने में ही हमारे अक्स को धुंधला रहा है…
एक नई-सी चेतना को अनदेखे ही सजा रहा है—
जो न पूर्णतः सत्य होती है,
न ही असत्य।
यह बस एक डगमगाती-सी लहर है,
जो हमें किसी एक ओर ठहरने नहीं देती।
इस संसार के सौंदर्य में लिपटी,
मंद-मंद महकती यह एक अनुभूति…
हमें अपने ही भीतर समेट लेती है—
मन को बड़ी कोमलता से मोह लेती है।
और फिर, सत्य से परे—
सब कुछ एक मनोहर-सा छलावा ही प्रतीत होता है।
ईर्ष्या अंतस की वह सूक्ष्म अग्नि है,
जो मौन रहकर भी भीतर ही सुलगती रहती है।
यह कभी प्रकट नहीं होती,
पर सहज ही चेतना को अपने रंग में रंगने लगती है।
और फिर—
हम स्वयं के अस्तित्व को भूलकर,
किसी और के प्रकाश में स्वयं को देखने लगते हैं।
जहाँ हम स्वयं के उन अनकहे हिस्सों को
महसूस करते हैं, देखते हैं…
जिनका आभास शायद हमें स्वयं भी नहीं होता।
जो हमें स्वयं के उन अनकहे हिस्सों को
महसूस कराता है, दिखाता है…
जिनका आभास शायद हमें स्वयं भी नहीं होता।

