कुछ बातें अनजानी सी, या एक मनमोहक कहानी सी…
कुछ बातें अनजानी सी, या एक मनमोहक कहानी सी…

मैंने सोचा,
वक़्त मेरे लिए ठहर जाएगा।
फिर मैंने सोचा—
मेरे लिए ही क्यों ठहरेगा वक़्त?
मुझमें ऐसा क्या है,
जो उसकी निरंतर बहती धारा को
एक क्षण को भी रोक सके,
या उसके विस्तार में
अपना ही कोई
नया ज्वार जगा सके।
वक़्त तो मदमस्त है,
जो केवल अपनी ही मस्ती में चलता जा रहा है।
उसे इससे कोई संबंध नहीं
कि राह में कौन खड़ा है,
कौन उसके साथ चलना चाहता है
और कौन उसे रोक लेना चाहता है।
वह तो बस
एक धीमी आँधी की भाँति
सबको अपने साथ बहाए लिए जा रहा है।
कोई चाहे भी...
तो वक़्त के इस एक क्षण मात्र को थाम नहीं सकता।
और यदि कोई
हमसे आगे निकल जाए,
तो हम अपनी गति बढ़ाकर भी
उसे पा नहीं सकते—
चाहे वह हमारा कितना ही प्रिय क्यों न हो।
वक़्त ने मानो सब कुछ निर्धारित कर रखा है।
हम सोचते हैं—
हमारा आज हम कल में जी लेंगे,
जो कुछ करना है वह कल कर लेंगे।
और इस प्रकार
हम अपना आज उस कल पर टाल देते हैं।
किन्तु वह कल तो कभी आया ही नहीं।
कल को किसी ने देखा भी नहीं।
फिर भी,
उस अनदेखे कल को
एक नए आश्वासन के रूप में मान कर,
हम अपने कार्यों को
बार-बार...
उसी के हवाले कर देते हैं—
मानो जो कुछ
देखना, समझना और जीना है,
सब संभव हो सकता है।
विचित्र है...
कि जिस कल को हम
इतने विश्वास से पुकार रहे हैं,
वह कभी हमारे सामने उपस्थित हुआ ही नहीं;
और जिस आज को
हम बार-बार टाल देते हैं,
वह ही एकमात्र सत्य बनकर
निरंतर हमारे साथ चले जा रहा है।
पर क्या यह अपेक्षा रखना
कि नया कल, एक नई आशा के साथ
एक नया अवसर लेकर आएगा...
हमारी उन सभी आकांक्षाओं को पूर्ण करने का
आश्वासन देगा...
जो आज तक अपूर्ण रह गई हैं—
क्या वास्तव में इतना गलत है?
क्या यह सचमुच केवल एक भ्रम है?
मैं मानना चाहता हूँ—
कि कहीं न कहीं यह आशा
सत्य है;
कि कहीं न कहीं इस भ्रम से परे भी
एक सत्य विद्यमान है।
शायद उस कल की आड़ में आज को जाने देना,
आज के अवसरों को गँवा देना,
और आज के कर्म को कल का भार बना देना गलत हो।
किन्तु उस आशा को थामे रखना
कि एक नया कल एक नए अवसर के साथ आएगा—
मैं मानना चाहूँगा कि यह सत्य है;
कि यह केवल एक भ्रम नहीं,
अपितु मेरी वास्तविकता है।
क्योंकि इस आशा से कम किसी बात पर विश्वास करना,
शायद स्वयं एक भ्रम होगा।
यह रचना समय, आशा,
वर्तमान और उस अनदेखे कल के बीच चलने वाले
आंतरिक संवाद की एक झलक है।
कभी-कभी हम अपने आज को कल के भरोसे टाल देते हैं,
जबकि जीवन निरंतर इसी क्षण में घटित हो रहा होता है।
फिर भी मन उस नए कल की प्रतीक्षा करना नहीं छोड़ता,
जो शायद एक नए अवसर, एक नई आशा और
स्वयं को नए रूप में देखने की संभावना लेकर आए।
माया · लीला · अनंत
Written by Maayedo